Friday, October 24, 2014

QUACKS, MEDICAL MAFIA AND THE GOVERNMENT

QUACKS, MEDICAL MAFIA AND THE GOVERNMENT


§ There is an acute shortage of doctors in India.
§ Thousands of patients die because doctors were not available to them.
§ The government is going to allow semi-skilled doctors to provide medical care where the skilled ones are not available.
§ Those who see this profession as a minting occupation than an opportunity to serve have started raising hue and cry.
§ 45% of medical trade is occupied by very simple prescription e.g. pain killers, gastric problems, depression problems etc.
§ Specialized medical treatment share is only 8.7% of the complete medical trade.
§ As per views by a survey 87% consumers are not satisfied the way they were treated with by these so called Trained Medical Experts.
Like other developing countries India is also facing an acute shortage of trained medical practitioners. As per statement of the concerned minister in November 2011 in India there was 1 doctor for 2000 patients. This medical population is usually concentrated in big cities. The picture assumes a more horrible face in villages and small towns. As per a report in The Guardian newspaper in 2009 in India one infant died every 15 seconds in want of a proper medical help.
To improve upon this grim scenario the government has decided:

§ Giving AYUSH docs the right to prescribe allopathic drugs after a one year course.
§ A compulsory Bachelor of Rural Health Care course
§ AIIMS-like institutions in various parts of the countries. They are going to be located in Patna, Bhopal, Bhubaneshwar, Jodhpur, Raipur and Rishikesh.
§ A compulsory bond that will force the docs to return to India after completing their medical education abroad.
§ Setting up of a centralized National Commission of Human Resources and Health which will have all other medical bodies in the country under its jurisdiction.
In response to this govt. initiative some people have started criticizing it. In their arrogant style they have coined a term – Hybrid Doctors. Critics are mostly those groups and people who are least bothered about the welfare of the country or the human beings but are largely guided by their capabilities of earning money and adversities related to it. For this group of thinkers (!) they and their needs always stand first in the queue.
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रोग, भोग और योग के आढ़तिये


रोग, भोग और योग के आढ़तिये


  • चारों तरफ़ गुरुओं की धूम मची है। हर विपणक के यहाँ योग से सम्बन्धित सामग्री बिक रही है। चारों ओर आढ़त का बाजार लगा है। लोग योग बेच रहे हैं  कुछ अन्य लोग योग खरीद रहे हैं। कोई आसन बेच रहा है, कोई अच्छे वाले आसन ईजाद कर रहा है। कोई ध्यान के सस्ते दाम लगा रहा है। किसी दुकान पर कुण्डलिनी उठवाई जा रही है।
  • कुछ लोग प्राणायाम बेच रहे हैं। बता रहे हैं कि माल अच्छा है, साथ में गारन्टी दे रहे हैं कि मोटापा कम कर देगा। इस ध्यान- योग के बाजार में कुछ दुकानों पर एक्सेसरीज़ भी बिक रही है।
  • ज्यादा भीड़ उन दुकानों पर है जहाँ एक्सेसरीज़ या तो हर्बल है या फिर उन्हें आयुर्वेद में से कहीं से आया बताया जा रहा है। पूरे बाजार  में चहल पहल है। चतुर सुजान, उत्तम वस्त्र पहनकर दुकानों के काउन्टर पर विराजे हुए हैं। मुद्राओं को रेशमी थैलियों में बन्द करके नीचे सरका रहे हैं।
  • जब योगसूत्र रचा गया था । पातंजलि के सामने कैलोरी बर्न की समस्या नहीं थी जबकि आज की मुख्य समस्या ही कैलोरी बर्न की है। पातंजलि के साधक के सामने कुण्ठा और आत्मरोध की वह घातक स्थिति नहीं थी जो आज के मनुष्य के सामने बॉस की डांट, बच्चों के एडमिशन, पुलिस की हेकड़ी, काम के दबाव, गलाकाट कम्पीटीशन आदि ने पैदा कर दी है। आज एल्कोहलिकों की तर्ज़ पर वर्कोहलिक पैदा हो रहे हैं। ये सब पातंजलि और योगसूत्र के लिए अज्ञात थीं अतः योगसूत्र के भीतर इनका निदान भी संभव नहीं है।


रोग, भोग और योग के आढ़तिये

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HOMEOPATHIC TREATMENT OF EBOLA VIRUS DISEASE

HOMEOPATHIC TREATMENT OF EBOLA VIRUS DISEASE



  • Ebola is a disease of humans and other mammals caused by an Ebola virus.
  • The symptoms start appearing two days to three weeks after getting the infection of this virus.
  • Its immediate symptoms are fever, sore throat, muscle pain and headaches.
  • Around this time, affected people may begin to bleed both within the body and externally. This is called internal and external hemorrhage.
  • Death, if it occurs, is typically 6 to 16 days from the start of symptoms and often due to low blood pressure from fluid loss.



BUT DON’T BE SCARED, HOMEOPATHY HAS THE ANSWER

The first treatment is likely to be given with the help of ARSENICUM ALBUM and ACONITUM.
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Sunday, August 3, 2014

मोदी का Niche Market प्रयोग

मोदी का Niche Market प्रयोग

 

1984 में काँग्रेस ने एक क्लीन स्वीप मैन्डेट प्राप्त किया था और भाजपा को मात्र दो सीटें मिलीं थी। तब लोगों ने भाजपा के खत्म हो जाने की बात की थी। लेकिन श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे एक अन्य प्रकार से परिभाषित किया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा ने सौ से अधिक स्थानों पर दूसरा स्थान प्राप्त किया है जो उसकी क्षमताओं और भविष्य के सुनहरेपन की ओर संकेत करता है। उनकी यह बात इतिहास में सच साबित हुई भी है। राजनीति में कई बार मरिचिकाएँ पैदा होती हैं। होता कुछ है तथा दिखाई कुछ और देता है।

1984 जैसा ही कुछ तीस बरसों के बाद 2014 में हुआ हालाँकि यह बिल्कुल भिन्न कारणों से हुआ। 1984 में यह स्वर्गीय श्रीमति गाँधी के प्रति सहानुभूति से पैदा हुआ था और 2014 में यह श्री मोदी के करिश्मे से हुआ है। एक दल और उसके गठबँधन को लोगों ने सिर आँखों पर बैठा लिया है और ऐसा लग रहा है कि अन्य सभी दल राजनीतिक भू-दृश्य के पिछवाड़े में फैंक दिये गये हैं। काँग्रेस को पहली बार 50 से भी कम सीटें मिलीं हैं। पूरा उत्तर प्रदेश भगवा हो गया है। इस रणभूमि के दो जाने माने यौद्धा – सपा और बसपा, खून से लथपथ पड़े दिख रहे हैं। प्रथम दृष्टया उत्तर प्रदेश से गैर-भाजपा राजनीति का विलोप हो गया लगता है। यही सामने बोर्ड पर लिखा संदेश दिखाई पड़ता है। प्रश्न है कि यह संदेश सच्चाई है या केवल आँखों का धोखा मात्र है। यह राजनीतिक सच्चाई है यह यह भी कोई दोपहरी वाली मरीचिका ही है जिसके नीचे या पीछे कुछ अलग तरह का सच है। इसके गंभीर विवेचन की आवश्यकता है। आओ देखें।

सबसे पहले 2014 के रंगमंच को निहारते हैं तो काँग्रेस अपने पुराने नारे (गरीबी हटाओ) के एक नए संस्करण के साथ खड़ी है और हाथों में उसने – खाद्य सुरक्षा बिल थाम रखा है। मोदी विकास वाद की हुँकार भर रहे हैं। गुजराती गवर्नेंस का मुकुट भी उन्होंने पहन रखा है। समाजवादी पार्टी अपने सामाजिक समरसता वाले विचारों और अपनी सरकारी उपलब्धियों की किताब के पाठ सुनाती पड़ रही है। एक अन्य तरफ़ बहनजी अपने नीले रथ पर सवार हैं। लेकिन उनके अस्त्र शस्त्र वही परमपरागत पहचान वाले लग रहे हैं जो पिछले चुनावी रण में भी इस्तेमाल किये गये थे।

इस बार इस चुनाव को मोदी ने अपनी शर्तों पर लड़ा है। इस बार के चुनाव में यह बात मोदी ने तय की कि इस चुनाव की कसौटी क्या होनी चाहिए और फिर उस कसौटी पर खुद को सफल दिखा दिया। मोदी ही तय कर रहे थे कि कौन सा नायक इस चुनाव 2014 की पटकथा में क्या भूमिका निभाएगा? मोदी के इतर किसी व्यक्ति या दल का यह पता ही नहीं था कि किया क्या जा रहा था? और जब तक उन्हें पता लग पाता तब तक चुनावी नतीजे आ चुके थे। कुछ गंभीर विश्लेषक तक यहाँ तक कहते हैं कि न सिर्फ अन्य विपक्षी दलों बल्कि जनता तक को पता नहीं चला कि इस चुनाव में वस्तुतः हो क्या रहा था? इस चक्रव्यूह का लाभ यह हुआ कि ना तो विपक्षी दल इसका हल ढूँढ पाए और ना ही मोदी के खिलाफ कोई प्रभावी वार कर पाए।

अब इस सारी तकनीक को सरल रूप में समझते हैं। अंग्रेजी में नॉर्डिक मूल का एक शब्द है – निच् (Niche)। जब इसे बाजार प्रणाली के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है तो यह कहलाता है निच् मार्केट (Niche Market)। इसे प्रयोग के द्वारा समझना आसान रहेगा। उदाहरणार्थ बाजार में दस फूड सप्लीमैंट्स हैं जो बालकों को प्रचुर कैलशियम उपलब्ध करवाने का दावा करते हैं। दसों फूड सप्लीमैंट्स में बिक्री के लिए घमासान मचा हुआ है। प्रचार पर भारी पैसा खर्चा किया जा रहा है। अचानक एक फूड सप्लीमैंट का निर्माता जनता को कहना शुरू करता है कि उसके सप्लीमैंट में एक ऐसा साल्ट भी है जो सप्लीमैंट वाले कैलशियम को शरीर तक पहुँचाता है। बिना साल्ट वाला कैलशियम किसी मतलब का नहीं है। वह यूँ ही शरीर से बाहर फेंक दिया जाएगा। साल्ट के बिना कैल्शियम तो बस मिट्टी जैसा है। अब उपभोक्ता सब कुछ भूलकर साल्ट वाले कैलशियम को खरीदने के लिए दौड़ पड़ते हैं। साल्ट वाला सप्लीमैंट बाजी मार लेता है। शेष सप्लीमैंट समान गुणवत्ता के होते हुए भी पीछे रह जाते हैं।

इस उदाहरण वाली बाजार प्रणाली में न सिर्फ प्रोडक्ट बेचा जा रहा है बल्कि एक ऐसी कसौटी भी साथ दी जा रही है जिस पर उस उत्पाद को कसा जाएगा। सामान्य नियमों के तहत् यह कसौटी उपभोक्ता की खुद की होनी चाहिए परन्तु बाजार की चतुराई यह है कि प्रोडक्ट का निर्माता स्वयं ही इस कसौटी को रच कर उपभोक्ता को थमा देता है। अब प्रोडक्ट भी उसी का है और प्रोडक्ट को जाँचने की कसौटी भी उसी निर्माता की है। अतः अब लाभ भी निश्चित ही उसी का हो जाता है। चुनाव 2014 में यही मोदी ने भी किया है।

राजनीति में इस निच् मार्केट का यह पहला प्रयोग नहीं है। श्रीमति इन्दिरा गाँधी – गरीबी हटाओ का सफल निच् मार्केट प्रयोग 70 के दशक में कर चुकी हैं। कुछ पहले 2013 में श्री केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में यही प्रयोग किया था। वहाँ उनका निच् था – भ्रष्टाचार उन्मूलन। केजरीवाल के पास भ्रष्टाचार उन्मूलन का कोई धवल रिकार्ड नहीं था बस जोरदार अन्ना आन्दोलन के सहारे उन्होंने सफलता पूर्वक यह दिखा दिया कि पूरी दिल्ली में केवल वही भ्रष्टाचार उन्मूलन कर सकते हैं। हालाँकि विधानसभा जीतने के बाद उन्होंने अपने निच् मार्केट में कुछ डाइल्यूशन किया। समाज-सुधार व साम्प्रदायिकता आदि मुद्दे जोड़ दिये। अनुभव कम था सो लोकसभा जीतने की जल्दबाजी में वो यह नहीं देख पाए कि साम्प्रदायिकता मुद्दे के उनसे बड़े राजनीतिक व्यापारी तो चुनावी बाजार में उनसे पहले से ही मौजूद थे। निच् मार्केट के डाइल्यूशन और कुछेक अन्य कारणों ने केजरीवाल को लुप्तप्रायः प्रजातियों की श्रेणी में लाकर रख दिया।

मोदी का निच् मार्केट था – विकास। इसे उन्होंने कुछेक सहायक सब- निच् मार्केट (Sub Niche Market) प्रत्ययों जैसे सबका विकास सबका साथ, भारतीय गौरव, सरकारी अकर्मण्यता के प्रति रोष आदि के साथ जोड़ दिया। और कमाल हो गया। विरोधियों को सूझा ही नहीं कि साम्प्रदायिकता आदि को लेकर जिस मोदी विरोध की तैयारी उन्होंने कर रखी थी और जो अब अचानक भोथरे हो गए थे उनका क्या किया जाए ?  और जब तक विपक्ष इस किंकर्त्तव्यविमूढ़ता से बाहर आता तब तक चुनाव खत्म हो चुके थे। इस नई व्यवस्था में चहुँ ओर मोदी ही मोदी हैं।

तो क्या यह राजनीतिक अवसान शुरू हो चुका है ? क्या भारतीय राजनीति अपने चरम् विकास को प्राप्त कर चुकी है ? क्या भारत में राजनीति समाप्त होने वाली है ?

भारत में सामाजिक विषमताओं का इतिहास रहा है। इसीलिये 1929 के रावी सम्मेलन में नेहरू जी को अपने समाजवादी सरोकारों को स्वीकार करना पड़ा था। भारतीय चुनावों में कांग्रेस की चरम विजय गाथाओं के बावजूद किसी ना किसी रूप में समाजवादी आंदोलन भारत में एक अनिवार्यता बनी रही। वर्तमान में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उसी समाजवादी आंदोलन के विकसित रूप हैं।

विकास की जिस अवधारणा को मोदी जी अवतरित करना चाहते हैं वह मूल स्वरूप में लगभग वही है जिसे नरसिंह राव सरकार ने शुरू किया था और मनमोहन सरकार ने जिसे पाला पोसा था। अब तक जिन सुधारों की बात मोदी जी ने की है वे केवल कॉस्मैटिक सुधार हैं। मोदी द्वारा प्रतिपादित सुधार नरसिंह-मनमोहन सिद्धाँत से आमूल चूल भिन्न नहीं हैं। मनमोहन सिंह के लिये अस्वीकार्यता और मोदी की स्वीकार्यता के बीच केवल बालिश्त भर का ही अंतर है। इस सिद्धाँत का प्रतिछोर अभी भी सामाजिक न्याय का सिद्धाँत है जो आज के समय में भी केवल सपा और बसपा ने ही थाम रखा है। यदि मोदी का विकास इस देश का सपना है तो सामाजिक न्याय यहाँ की हकीकत है। जिस समय भी आप नींद की खुमारी से बाहर आएंगे तो हकीकत की जमीन पर ही खड़ा होना होगा।

सामाजिक न्याय को हकीकत कहने का अर्थ यह नहीं कि नेहरू जी के प्रजातान्त्रिक समाजवाद को पुनर्जीवित किया जाए या आचार्य नरेन्द्र देव के किसी नए अवतार को खोजा जाए। इतिहासों में दोहराए जाने की सुविधा नहीं होती। यहाँ सदैव नूतनता ही फलती है। पुराने को मिटना होता है। समाजवाद की पारम्परिक अवधारणा में मुफ्त राशन और सस्ते राशन की सुविधाओं की बात की जाती थी अब उतने से काम नहीं चलने वाला है। सामाजिक न्याय की नई अवधारणा में भी राशन की पूरी मात्रा या मिट्टी के तेल की सुविधा के बजाय आधुनिक सोच की जैसे – समाज के अंतिम व्यक्ति को बेजा कराधान से मुक्ति, इंस्पेक्टरों के कहर से सुरक्षा, नए सॉफ्टवेयरों के विकास का ढाँचा आदि को विकसित करना होगा। विचार को मुफ्त लैपटॉप वितरण से भी आगे सुगम इलेक्ट्रॉनिक विकास का सोचना होगा। जैसे जैसे समय आगे बढ़ता है सामाजिक न्याय की अवधारणा भी अपने अर्थों में विकसित होती है। और इसे होना भी चाहिए। ताकि विकास एक लुभावने नारे की परिधि से बाहर निकल कर सामाजिक न्याय की अवधारणा का ही एक आयाम बन जाए। जिस दिन ऐसा हो पाएगा इक्कीसवीं सदी का सामाजिक न्याय मूर्तिमान होकर हकीकत बन जाएगा।

लोकतंत्र में केवल दो ही प्रकार के समय होते हैं। पहला चुनावों का समय और दूसरा चुनावों की तैयारी का समय। मोदी ने इस सिद्धाँत को समझा। भीषण तैयारी की और चुनाव जीत गये। फिलहाल यह चुनाव तैयारी का समय है। अब देखना यह है कि कितने लोग या दल इस सिद्धाँत को समझ कर चुनाव की तैयारी के समय का सदुपयोग कर पाते हैं ताकि चुनाव समय पर वे  अपनी सीटें जीतते हुए खुशी महसूस कर पाएँ।


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http://psmalik.com/charcha/228-vichardara

Monday, June 9, 2014

कालाधन सिर्फ काला नहीं होता

कालाधन सिर्फ काला नहीं होता




जो भी धन स्थापित व्यवस्थाओं के उल्लंघन से हासिल किया जाता है वही काला धन होता है। सरल शब्दों में कहें तो बिना टैक्स चुकाए जो धन सरकार से छिपाया जाता है वह काला धन होता है।

जब सरकार की नीतियाँ अस्थिर, शोषणकारी और दमनपूर्ण होंगी और उसके साधन हर स्थान पर उपलब्ध नहीं होंगे तो जनता का सक्षम वर्ग भविष्य की सुरक्षा के लिए अपनी आय को छुपा लेता है और काले धन का निर्माण करता है। ऐसा भी संभव है कि आय उन साधनों से हुई हो जिन्हें सरकार ने प्रतिबंधित किया हुआ है। जैसेकि प्रतिबंधित वस्तुओं की बिक्री करके या घूस आदि लेकर।

काले धन के कई प्रकार हैं।
·       आम लोगों का काला धन
·       उद्योगपतियों का काला धन
·       राजनेताओं का काला धन
·       ब्यूरोक्रेट्स का काला धन
1.     आम लोग अपनी घोषित कमाई के अलावा भी एकाध काम जैसे – सुबह अखबार बेचकर, लिफाफे बना कर, छोटी मोटी मशीनें लगा कर, कोई टॉफी-बिस्कुट की दुकान खोलकर आदि करके कुछ कमाई कर लेते हैं और सरकार से छुपा लेते हैं। इस धन का मुख्य उद्देशय अपने सामाजिक भविष्य को सुरक्षित करना होता है। आकार में यह कालाधन इतना सूक्ष्म है कि सरकारें इस पर आमतौर से विचार भी नहीं करतीं।
2.     उद्योगपति अपने उद्योगों से होने वाली कमाई का पूरा ब्यौरा ना देकर कुछ काला धन कमाते हैं। कई बार इसका आकार बहुत बड़ा भी हो सकता है। उद्योगपति को इस कालेधन की जरूरत सरकारी बाबूओं, अधिकारियों और मजदूर नेताओं आदि की जरूरतें पूरी करने के लिये होती है।
a.      किसी उद्योगपति के पास कुछ काला होता है तो वह उसका इस्तेमाल नया उद्योग खड़ा करने में करता है जिससे अधिक उत्पादन और रोजगार पैद होता है। भारत जैसी अधकचरी अर्थव्यवस्थाओं में यदि ऐसे काले धन को समाप्त किया गया तो यह उद्योगों के लिये ही विनाशकारी होगा। उद्योग तबाह हो जाएँगे। इस काले धन को समाप्त नहीं किया जा सकता।
3.     कालेधन का एक अन्य प्रकार राजनेता के पास होता है। कई राजनेताओं को राजनीति में बचे रहने के लिए अनेक ऐसे जनकल्याणकारी कार्य करने होते हैं जिनके लिए सरकार से कोई धन प्राप्त नहीं होता। बाहरी दिल्ली का एक प्रसिद्ध युवा नेता अपने व्यक्तिगत पैसे से एक हजार के लगभग वृद्धाओं को मासिक पेंशन देता है।
a.      राजनेताओं का कालाधन एक बुरे काम के लिए भी इस्तेमाल होता है। यह राजनीतिक अस्थिरता और कानूनी अराजकता के लिए भी प्रयोग किया जाता है। उस अवस्था में यह देश-समाज के लिए नुकसानदेह होता है।
b.     राजनेताओं के काले धन के बहुमुखी इस्तेमाल की संभावनाओं के मद्देनज़र इसे पूरी तरह नष्ट करने की सोचना उचित नहीं होगा। राजनेताओं के कालेधन को नष्ट करने की बजाय इसे रेगुलेट करने की सोचनी चाहिए। इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए।
4.     सबसे बुरा कालाधन ब्यूरोक्रेट्स का कालाधन होता है। यह धन आम आदमी के शोषण से पैदा होता है। ब्यूरोक्रेट्स का काला धन आम जनता की परचेजिंग पावर को घटा कर पैदा किया जाता है अतः यह बाजार के खिलाफ काम करता है। दूसरा यह उत्पादन को बढ़ाए विना ही बाजार में (काला)धन झोंक देता है अतः महँगाई को बढ़ाता है। यह ही वह कालाधन है जो स्विस बैंकों की पासबुकों के पृष्ठ सँख्याओं को बढ़ाता है। यही वह कालाधन है जिसको बढ़ाने के लिए बाबू और अधिकारी मिलकर आम जनता के कामों को रोकते हैं और कानूनों की अबूझ पेचीदगियाँ पैदा करते हैं। यह ही वह धन जिसकी मात्रा अकूत होती है। आम आदमी इसी काले धन से त्रस्त होता है। इसी पर लगाम लगाए जाने की जरूरत है।


कालेधन की समस्या पर काम करने के लिए सरकार को अपनी सोच स्पष्ट करनी होगी- कौन सा कालाधन? वह क्यों पैदा होता है? उसे पैदा करने में वर्तमान व्यवस्था के कौन से तत्त्व जिम्मेदार हैं? पूरी व्यवस्था में कौन से सुधार दरकार हैं जिनके बाद कालेधन की जरूरत ही ना रहे? इन सभी आधारों पर सोचकर ही कालेधन पर कुछ युक्तिसँगत कहा जा सकेगा।

इसी दिशा में एक सुझाव यह भी है जितना संभव हो कालाधन अनुमोदित, नियंत्रित या प्रतिवंधित किया जाए और शेष कालाधन जिस पर किसी भी प्रकार का कानूनी आचरण संभव नहीं है उसका राजनीतिक-सामाजिक उपयोग किया जाए। एक ऐसे कोष की संभावना पर विचार किया जा सकता है जो लगभग स्विस बैंको की तर्ज पर हो और जिसमें जमा करवाए गये धन के स्रोत के विषय में कभी भी ना पूछे जाने की गारँटी दी जाए। ऐसे अज्ञात-स्रोत वाले धन के स्वामियों को ब्याज ना दिया जाए बल्कि एक बहुत मामूली सी राशि उनके धन को हिफ़ाजत के साथ सुरक्षित रखनें के लिए उनसे ही ले ली जाए। बस सरकारी नियँत्रण इतना ही हो कि ऐसे जमाकर्ता एक निश्चित समय जैसे एक या दो वर्ष तक उस रकम को खाते में बनाए रखने का वचन दें ताकि सरकार के पास उस धन का एक निरंतर प्रवाह और निवेश बना रहे।

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